सीएम कैंडिडेट तेजस्वी यादव ‘नायक’ तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी ‘जननायक’ ! बिहार चुनाव की तपिश के बीच राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस ने अपने-अपने नेता को जिस तरह स्वयं उक्त पदवी दे डाली, यह स्तब्धकारी है! क्या दोनों राजनीतिक पार्टियां इस विवेक से वंचित हैं कि उनके इस बचकाने खेल का ख़ामियाजा किसे, कैसे और कितना चुकाना पड़ेगा ?
उन्हें सचमुच नहीं पता कि हमारे यहां पदवियों की क्या महत्ता-गरिमा है? बापू को ‘राष्ट्रपिता ‘ और कवींद्र रवीन्द्र नाथ टैगोर को ‘गुरुदेव’ की पदवी दिए जाने की कहानी आज भी कितनी ऊर्जादायिनी है! दो महापुरुषों ने एक-दूसरे के प्रति अपनी भावनाओं को शब्द भर दिए थे, देश के लिए यह धार्य हो गया!
जयप्रकाश नारायण को भारतीय समाज ने जिस राजनीतिक भूमिका (‘संपूर्ण क्रांति’) के लिए ‘लोकनायक’ की उपाधि दी, उसे इतिहास के विशेषज्ञों ने पहली ‘जन क्रांति’ माना है? राज्यों से लेकर केन्द्र तक, इसी क्रांति के सिपाही दशकों से सत्ता में काबिज़ हैं!
सवाल यह कि क्या राहुल गांधी को ‘जननायक’ घोषित कर कांग्रेस ने, वस्तुत: ग़ैर कांग्रेसवाद के योद्धा रहे कर्पूरी ठाकुर के प्रति अपनी प्रतिशोध-भावना व्यक्त की है?
एक मोर्चे में रह कर भी दोनों दल भीतर-भीतर क्यों परस्पर सींग ताने हुए हैं ? इससे यह चिंताजनक संकेत आम हुआ है कि महागठबंधन के दोनों प्रमुख घटकों का नेतृत्व जवाबदेह लोगों के हाथ में नहीं है! ऐसा नहीं होता तो वह अवश्य इस तथ्य से वाक़िफ होते कि बिहार में सत्ताधारी मोर्चा एनडीए का विकल्प प्रस्तुत करने का उनका दायित्व कितना गुरुतर है! यह वह भूमिका है, जिसमें लोकतंत्र का भविष्य और उसके प्राण बसे हुए हैं!
आश्चर्य तो यह कि बिहार में विपक्ष ने लंबे समय से सीएम नीतीश कुमार के स्वास्थ्य को लेकर जितना ही भ्रम फैला रखा था, वह चुनाव अभियान में उतने अधिक उत्साह के साथ सक्रिय हैं। दूसरी ओर, युवा कहे जाने वाले राहुल गांधी ने, सितंबर के शुरू में बिहार आकर चुनाव अभियान तो छेड़ दिया लेकिन उसके बाद गज़ब गायब हो गए! इस तरह कि दो माह तक मुड़कर ताका तक नहीं।



